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स्वास्थ्य-रक्षक अनमोल उपहार
तक्र (छाछ)


दूध में जोरन (थोड़ा दही) डालने से दही के जीवाणु बड़ी तेजी से बढ़ने लगते हैं और वह दूध 4-5 घंटों में ही जमकर दही बन जाता है। दही में पानी डालकर मथने पर मक्खन अलग करने से वह छाछ बनता है। छाछ न ज्यादा पतली होती हो, न ज्यादा गाढ़ी। ऐसी छाछ दही से ज्यादा गुणकारी होती है। यह रस में मधुर, खट्टी-कसैली होती है और गुण में हलकी, गरम तथा ग्राही होती है।
छाछ अपने गरम गुणों, कसैली, मधुर, और पचने में हलकी होने के कारण कफनाशक और वातनाशक होती है। पचने के बाद इसका विपाक मधुर होने से पित्तप्रकोप नहीं करती।
भोजनान्ते पिबेत् तक्रं वैद्यस्य किं प्रयोजनम्।
भोजन के उपरान्त छाछ पीने पर वैद्य की क्या आवश्यकता है?
छाछ भूख बढ़ाती है और पाचन शक्ति ठीक करती है। यह शरीर और हृदय को बल देने वाली तथा तृप्तिकर है। कफरोग, वायुविकृति एवं अग्निमांद्य में इसका सेवन हितकर है। वातजन्य विकारों में छाछ में पीपर (पिप्ली चूर्ण) व सेंधा नमक मिलाकर कफ-विकृति में अजवायन, सोंठ, काली मिर्च, पीपर व सेंधा नमक मिलाकर तथा पित्तज विकारों में जीरा व मिश्री मिलाकर छाछ का सेवन करना लाभदायी है। संग्रहणी व अर्श में सोंठ, काली मिर्च और पीपर समभाग लेकर बनाये गये 1 ग्राम चूर्ण को 200 मि.ली. छाछ के साथ लें।
सावधानीः मूर्च्छा, भ्रम, दाह, रक्तपित्त व उरःक्षत (छाती का घाव या पीड़ा) विकारों में छाछ का प्रयोग नहीं करना चाहिए। गर्मियों में छाछ नहीं पीनी चाहिए। यदि पीनी हो तो अजवायन, जीरा और मिश्री डालकर पियें।




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Benefits Of Guava / अमरूद और आयुर्वेद

क्या चीज है ये अमरुद भी.  किसी जमाने में इसे ग़रीबों का सेब कहा जाता था . आखिर क्यों न कहा जाए. इसमें इतने सारे तत्व पाए जाते हैं कि शरीर में पहुँचते ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं. ये अकेला ऐसा फल है जिसको खाने के बाद अजीब सी प्रसन्नता का अनुभव होता है यानी कि मन खुश हो जाता है. आइये जानते हैं आज इसके बारे में कि ये अपने भीतर आखिर क्या छुपाये हुए है कि बाज़ारों में यूं इठला इठला कर बरबस ही ध्यान खींच लेता है –

इसे हिन्दी में जामफल भी कहते हैं.संस्कृत में पेरुकम, दृढबीजं, अरबी में कम्सुरा, मराठी में पेरू, बंगाली में पियारा, गुजराती में जामफड़े , तेलगू में गोइया, द्रविण में कोईया, कर्नाटक में शिवे, और वैज्ञानिक भाषा में सिडियम गुआबिया कहते हैं.

आयुर्वेद में अमरुद को मधुर, ग्राही, कफकारक, वातवर्धक, स्वादिष्ट, शीतल, तीक्ष्ण, भारी, त्रिदोष नाशक और साथ में भ्रम ,मूर्छा और शारीरिक जलन को नष्ट करने वाला माना गया है.

अमरुद में ल्यू कोसायनीदीन, क्वेरसेटिन, बीता सितो-स्तीराल, गुवाजेवरीन , लिमोनीन, पिनीन, निओसीन,विटामिन-बी ६,विटामिन-सी, कैदिनिन, सिट्रिक, रीबोफ्लेविन, एमिनो एसिड, स्टार्च, ग्लूकोज, फ्रक्टोज, सुक्रोज, टैनिन्स, थायमिन, कीरोटिन,आक्जेलिक, क्वीनिक, सक्सीनिक, मलिक, तार्तेरिक एसिड, फार्नेसिं, करक्यूमिन, सिनामिक, रहामनोज जैसे तत्वों की भरमार होती है.

अमरुद तो अमरुद इसके पत्ते, पेड़ की छाल, जड़ भी दवाओं का काम करते हैं-


* अगर पेट में दर्द हो या बदहजमी की स्किकायत हो तो इसके कोमल पत्ते पीस कर रस निकालिए और ३०- ३५ ग्राम पिला दीजिये.

* मुंह में कोई घाव हो या मसूड़ों से खून आता हो तो अमरुद के पत्तों का काढा बनाकर उसे ५-५ मिनट मुंह में रख कर कुल्ला कीजिए.

* बहुत दस्त हो रहे हो तो पत्तों का काढा २५-२५ ग्राम २-३ बार पिला दीजिये.

* अगर किसी को भांग का नशा चढ़ गया हो तो अमरुद खिला दीजिये ,नशा उतर जाएगा.

* हैजे के कारण उल्टी, दस्त हो रहा हो तो अमरुद के पत्तों का काढा बहुत तेज फ़ायदा करेगा.

* दांतों में दर्द हो रहा हो तो अमरुद के पत्ते चबाएं.

* बच्चो को अगर बहुत दिनों से दस्त की शिकायत है तो अमरुद की बीस ग्राम जड़ को दो सौ ग्राम पानी में उबालिए जब आधा से भी थोड़ा कम पानी बचे तो उतार लीजिये और छान लीजिये. एक-एक चम्मच सुबह दोपहर शाम को पिलायें . बीमारी ख़त्म.

* आप कब्ज से परेशान हों तो शाम को चार बजे कम से कम २०० ग्राम अमरुद नमक लगाकर खा जाया करें, फायदा अगली सुबह से ही नज़र आने लगेगा. १० दिन तो खा ही लीजिये फिर जब तक मन करे तब तक खाएं.

*  अमरूद हृदय को मजबूत करता है, दिमाग को भी शक्ति देता है और पाचन शक्ति दुरुस्त करता है. मीठा अमरुद पेचिश में भी फायदा पहुंचता है .अगर भोजन के बाद एक अमरुद खाया जाए तो भोजन में मौजूद सारे तत्व आसानी से पाच जाते हैं अर्थात खाना शरीर में लगता है. इसको खाने से मन प्रसन्न रहता है.यह भूख को भी बढाता है.

* अगर आँखों में सूजन आ गयी हो तो इसके फूलों को मसल कर लेप कर दीजिये. सूजन ख़त्म भी होगी आँखों की रोशनी भी तेज होगी.

* अमरुद को पतला पतला काटिए अब उस पर काली मिर्च का पावडर ,नमक ,थोड़ी चीनी और नीम्बू डालिए. कुछ देर ढक के रख दीजिये .फिर चाव से खाइए.




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सुखद प्राणायम (थकान भगाने का शास्त्रीय प्रयोग)

सुखद प्राणायम - कैसी भी थकान हो भाग जायेगी और सुख चैन का अनुभव होगा | पूरक किया अगर गरम ऋतू है गरमी जैसे मार्च, अप्रैल, मई, जून है उन दिनों में करना है तो श्वास बाहें नाक से लें... रोके जितने देर रोक सकते है | फिर दाहें से छोड़े| ऐसे १ – २ बार खाली बाहें में से लें ... गरमी का कुप्रभाववाली उर्जा पैदा हो जायेगी | ज्यादा बाहें से लेंगे तो भूख मर जायेगी | गरमी मिटाना है तो १ – २ बाहें लें लिया | सर्दी मिटाना है १ – २ दाहें से बढ़ाना | जितनी देर सहज में रोक सके... बलपूरक नहीं | रोकें ...फिर मुहँ से श्वास ऐसे छोड़े.. जैसे होठों से जैसे सिटी बजाते है ना ऐसे श्वास छोड़े ... रुक – रुक के छोड़े ... ३ बार रुक रुक के छोड़े उसके बाद आखिरी में बलपूर्वक छोड़े... फु ..... ऐसे ५ – ७ करने से बड़ा सुख होगा स्वभाव की खिन्नता चली जायेगी | स्वभाव में सुख आयेगा|





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पृथ्वी पर का अमृतः गाय का दूध

गाय का दूध पृथ्वी पर सर्वोत्तम आहार है। उसे मृत्युलोक का अमृत कहा गया है। मनुष्य की शक्ति एवं बल को बढ़ाने वाला गाय का दूध जैसा दूसरा कोई श्रेष्ठ पदार्थ इस त्रिलोकी में नहीं है। पंचामृत बनाने में इसका उपयोग होता है।
गाय का दूध पीला होता है और सोने जैसे गुणों से युक्त होता है।
केवल गाय के दूध में ही विटामिन ए होता है, किसी अन्य पशु के दूध में नहीं।

गाय का दूध, जीर्णज्वर, मानसिक रोगों,मूर्च्छा, भ्रम, संग्रहणी, पांडुरोग, दाह, तृषा, हृदयरोग, शूल,गुल्म, रक्तपित्त, योनिरोग आदि में श्रेष्ठ है।
प्रतिदिन गाय के दूध के सेवन से तमाम प्रकार के रोग एवं वृद्धावस्था नष्ट होती है। उससे शरीर में तत्काल वीर्य उत्पन्न होता है।
एलोपैथी दवाओं,रासायनिक खादों, प्रदूषण आदि के कारण हवा,पानी एवं आहार के द्वारा शरीर में जो विष एकत्रित होता है उसको नष्ट करने की शक्ति गाय के दूध में है।
गाय के दूध से बनी मिठाइयों की अपेक्षा अन्य पशुओं के दूध से बनी मिठाइयाँ जल्दी बिगड़ जाती हैं।
गाय को शतावरी खिलाकर उस गाय के दूध पर मरीज को रखने से क्षय रोग (T.B.)  मिटता है।
गाय के दूध में दैवी तत्त्वों का निवास है। गाय के दूध में अधिक से अधिक तेज तत्व एवं कम से कम पृथ्वी तत्व होने के कारण व्यक्ति प्रतिभासम्पन्न होता है और उसकी ग्रहण शक्ति (Grasping Power) खिलती है। ओज-तेज बढ़ता है। इस दूध में विद्यमान 'सेरीब्रोसाडस' तत्व दिमाग एवं बुद्धि के विकास में सहायक है।
केवल गाय के दूध में ही Stronitan तत्व है जो कि अणुविकिरणों का प्रतिरोधक है। रशियन वैज्ञानिक गाय के घी-दूध को एटम बम के अणु कणों के विष का शमन करने वाला मानते हैं और उसमें रासायनिक तत्व नहीं के बराबर होने के कारण उसके अधिक मात्रा में पीने से भी कोई 'साइड इफेक्ट' या नुकसान नहीं होता।
कारनेल विश्वविद्यालय के पशुविज्ञान के विशेषज्ञ प्रोफेसर रोनाल्ड गोरायटे कहते हैं कि गाय के दूध से प्राप्त होने वाले MDGI  प्रोटीन के कारण शरीर की कोशिकाएँ कैंसरयुक्त होने से बचती हैं।
गाय के दूध से कोलेस्टरोल नहीं बढ़ता बल्कि हृदय एवं रक्त की धमनियों के संकोचन का निवारण होता है। इस दूध में दूध की अपेक्षा आधा पानी डालकर, पानी जल जाये तब तक उबालकर पीने से कच्चे दूध की अपेक्षा पचने में अधिक हल्का होता है।
गाय के दूध में उसी गाय का घी मिलाकर पीने से और गाय के घी से बने हुए हलुए को, सहन हो सके उतने गर्म-गर्म कोड़े जीभ पर फटकारने से कैंसर मिटने की बात जानने में आयी है।
गाय का दूध अत्यंत स्वादिष्ट,स्निग्ध, मुलायम, चिकनाई से युक्त, मधुर, शीतल, रूचिकर, बुद्धिवर्धक, बलवर्धक,स्मृतिवर्धक, जीवनदायक, रक्तवर्धक, वाजीकारक, आयुष्यकारक एवं सर्वरोग को हरनेवाला है। 





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