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Showing posts with label 1.योग और प्राणायाम(yog and pranayam). Show all posts

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ब्रम्हचर्य सहायक प्राणायाम


सीधा लेट जाये पीठ के बल से.. कान में रुई के छोटे से बॉल बना के कान बंद कर देना | अब नजर नासिका पर रख देना और रुक-रुक के श्वास लेता रहें | आँखों की पुतलियाँ ऊपर चढ़ा देना ...शांभवी मुद्रा शिवजी की जैसी है| वो एकाग्रता में बड़ी मदद करती है | जिसको अधोमुलित नेत्र कहते है | आँखों की पुतली ऊपर चढ़ा देना ... दृष्टि भ्रूमध्य में टिका लेना ... जहाँ तीलक किया जाता है वहाँ | आँखे बंद होने लगेगी ... कुछ लोग बंद करते है तो मनोराज होता है, दबा के बंद करता है सिर दुखता है | ये स्वाभाविक आँखे बंद होने लगेगी | बंद होने लगे तो होने दो | शरीर को शव वत ढीला छोड़ दिया .... चित्त शांत हो रहा है ॐ शांति .... इंद्रिया संयमी हो रही है .... फिर क्या करें.. फिर कुंभक करें .. श्वास रोक दे ... जितने देर रोक सकते है ... फिर एकाक न छोड़े, रिदम से छोड़े ...बाह्य कुंभक ...अंतर कुंभक.. दोनों कुंभक हो सकते है | इससे नाडी शुद्ध तो होगी और नीचे के केन्द्रों में जो विकार पैदा होते है वो नीचे के केन्द्रों की यात्रा ऊपर आ जायेगी | अगर ज्यादा अभ्यास करेंगा आधा घंटे से भी ज्यादा और तीन time करें तो जो अनहदनाद अंदर चल रहा है वो शुरू हो जाएगा | गुरुवाणी में आया – अनहद सुनो वडभागियाँ सकल मनोरथ पुरे | तो कामविकार से रक्षा होती है और अनहदनाद का रस भी आता है, उपसाना में भी बड़ा सहायक है



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स्मृतिवर्धक प्राणायम 


बायें पैर की एडी गुदा द्वार पे रख दें | जैसे सिद्ध आसन में बैठते है | दायने पाँव की एडी बायें पैर की जांघो पर लगा दें और  ठोडी छाती के तरफ कर दें | इसको जालंदर बंद बोलते है | इससे स्मृति गजब की बढती है |आँखे बंद कर दे ... गहरा श्वास लें .... उसको रेचक बोलते है | फिर रोके ... उसको कुंभक बोलते है और फिर पहले तो श्वास लें ...छोड़े ... छोड़ना रेचक है... लेना पूरक है ... रोकना कुंभक है | तो रेचक, कुंभक, पूरक, कुंभक, रेचक अभ्यास करें और ये अभ्यास १५ – २० – २५ - ३० मिनट... एक घंटे तक बढ़ा सकते है आप | गजब की स्मृति बढ़ेगी और तन के कई रोग भी मिटेंगे और मानसिक तनाव भाग जायेगें |


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सुखद प्राणायम (थकान भगाने का शास्त्रीय प्रयोग)

सुखद प्राणायम - कैसी भी थकान हो भाग जायेगी और सुख चैन का अनुभव होगा | पूरक किया अगर गरम ऋतू है गरमी जैसे मार्च, अप्रैल, मई, जून है उन दिनों में करना है तो श्वास बाहें नाक से लें... रोके जितने देर रोक सकते है | फिर दाहें से छोड़े| ऐसे १ – २ बार खाली बाहें में से लें ... गरमी का कुप्रभाववाली उर्जा पैदा हो जायेगी | ज्यादा बाहें से लेंगे तो भूख मर जायेगी | गरमी मिटाना है तो १ – २ बाहें लें लिया | सर्दी मिटाना है १ – २ दाहें से बढ़ाना | जितनी देर सहज में रोक सके... बलपूरक नहीं | रोकें ...फिर मुहँ से श्वास ऐसे छोड़े.. जैसे होठों से जैसे सिटी बजाते है ना ऐसे श्वास छोड़े ... रुक – रुक के छोड़े ... ३ बार रुक रुक के छोड़े उसके बाद आखिरी में बलपूर्वक छोड़े... फु ..... ऐसे ५ – ७ करने से बड़ा सुख होगा स्वभाव की खिन्नता चली जायेगी | स्वभाव में सुख आयेगा|





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बाह्य धारणा (त्राटक)

परमात्मा अचल, निर्विकार, अपरिवर्तनशील और एकरस हैं। प्रकृति में गति, विकार, निरंतर परिवर्तन है। मानव उस परमात्मा से अपनी एकता जानकर प्रकृति से पार हो जाये इसलिए परमात्म-स्वरूप के अनुरूप अपने जीवन में दृष्टि व स्थिति लाने का प्रयास करना होगा। प्रकृति के विकारों से अप्रभावित रहने की स्थिति उपलब्ध करनी होगी। इस मूल सिद्धान्त को दृष्टि में रखकर एक प्रभावी प्रयोग बता रहे हैं जिसे 'बाह्य धारणा' कहा जाता है। इसमें किसी बाहरी लक्ष्य पर अपनी दृष्टि को एकाग्र किया जाता है। इस साधना के लिए भगवान की मूर्ति, गुरुमूर्ति, ॐ या स्वास्तिक आदि उपयोगी हैं। शरीर व नेत्र को स्थिर और मन को निःसंकल्प रखने का प्रयास करना चाहिए।

इससे स्थिरता, एकाग्रता व स्मरणशक्ति का विकास होता है। लौकिक कार्यों में सफलता प्राप्त होती है, दृष्टि प्रभावशाली बनती है, सत्यसुख की भावना, शोध तथा सजगता सुलभ हो जाती है। आँखों में पानी आना, अनेकानेक दृश्य दिखना ये इसके प्रारंभिक लक्षण है। उनकी ओर ध्यान न देकर लक्ष्य की ओर एकटक देखते रहना चाहिए। आँख बन्द करने पर भी लक्ष्य स्पष्ट दिखने लगे और खुले नेत्रों से भी उसको जहाँ देखना चाहे, तुरंत देख सके – यही त्राटक की सम्यकता का संकेत है।

नोटः कृपया इस विषय अधिक जानकारी के लिए देखें – आश्रम से प्रकाशित पुस्तक पंचामृत (पृष्ठ 345), शीघ्र ईश्वर प्राप्ति, परम तप।





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लाभः इससे चन्द्र नाड़ी क्रियाशील हो जाती है। शरीर के समस्त नाड़ी  मंडल में शीतलता का संचार होता है।
उच्च रक्तचाप वालों के लिए यह लाभदायी है।
यह प्राणायाम 5 बार नियमित करने से पित्तप्रकोप शांत होता है। आँखों की जलन, नाक से खून बहना आदि रोगों में लाभदायक है।
मन शांत हो जाता है। शरीर की थकान दूर होती है।


विधिः यह सूर्यभेदी से ठीक विपरीत है। इसमें बायें नथुने से श्वास लेकर भीतर ही कुछ समय रोकें। बाद में दाहिने नथुने से धीरे-धीरे श्वास छोड़ दें। इस प्रकार 3 से 5 बार प्राणायाम करें।


सावधानीः सर्दियों में तथा कफ प्रकृतिवालों के लिए यह हितकर नहीं है। निम्न रक्तचापवालों के लिए भी यह प्राणायाम निषिद्ध है।
(आसन-प्राणायाम आदि किसी अनुभवी के मार्गदर्शन में सीखें।)




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सूर्यभेदी प्राणायाम( Surya Bheda Pranayama)

जैसे सूर्य सारे सौरमण्डल को उष्णता प्रदान करता है, वैसे ही सूर्यभेदी प्राणायाम से शरीर के सम्पूर्ण नाड़ी-मंडल में ऊष्मा का संचार हो जाता है।

लाभः इससे सूर्य नाड़ी क्रियाशील हो जाती है।
सर्दी, खाँसी, जुकाम दूर हो जाते हैं व पुराना जमा हुआ कफ निकल जाता है। मस्तिष्क का शोधन होता है।
इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है।
कमर के दर्द में यह लाभदायी है।

विधिः प्रातः पद्मासन अथवा सुखासन में बैठकर बायें-नथुने को बंद करें और दायें नथुने से धीरे-धीरे अधिक-से-अधिक गहरा श्वास भरें। श्वास लेते समय आवाज न हो इसका ख्याल रखें।
अब अपनी क्षमता के अनुसार श्वास भीतर ही रोके रखें।
श्वास बायें नथुने से धीरे-धीरे बाहर छोड़ें। झटके से न छोड़ें। इस प्रकार 3 से 5 प्राणायाम करें।
सावधानियाँ- इस प्राणायाम का अभ्यास सर्दियों में करें। गर्मी के दिनों में तथा पित्तप्रधान व्यक्तियों के लिए यह हितकारी नहीं है।
स्वस्थ व्यक्ति उष्णता तथा शीतलता का संतुलन बनाये रखने के लिए सूर्यभेदी प्राणायाम के साथ उतने ही चन्द्रभेदी प्राणायाम भी करे।




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