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उष्ट्रासन( Ustrasana)

इसमें शरीर का आकार ऊँट (ऊष्ट्र) की तरह बनने से इसे ʹउष्ट्रासनʹ कहते हैं।

लाभः गर्दन, कंधा, रीढ़, हाथ व पैरों के स्नायु मजबूत होते हैं।
प्राणतंत्र सक्रिय, नेत्रज्योति में वृद्धि, सीना सुडौल व धड़कन की अनियमितता दूर होती है। मुख्य रक्तवाहक नाड़ियों को बल मिलता है तथा खिसकी हुई नाभि यथास्थान स्थित हो जाती है।
शारीरिक दुर्बलता, स्थायी सिरदर्द, कब्ज, पेटदर्द व मंदाग्नि में अत्यधिक लाभकारी है। झुके हुए कंधे, कूबड़, पीठदर्द, कमरदर्द, दमा, मधुमेह, हृदयरोग – इन सबके उपचार में यह अत्यंत सहायक है।

विधिः वज्रासन में बैठें। फिर घुटनों के बल खड़े हो जायें। घुटनों से कमर तक का भाग सीधा रखें व पीठ को पीछे की ओर मोड़कर हाथों से पैरों की एड़ियाँ पकड़ लें।
अब सिर को पीछे झुका दें। श्वास सामान्य, दृष्टि जमीन पर व ध्यान विशुद्धाख्य चक्र (कंठस्थान) में हो। इस अवस्था में 10-15 सैकेण्ड रुकें।
आसन छोड़ते समय हाथों की एड़ियों से हटाते हुए सावधानीपूर्वक वज्रासन में बैठें व सिर को सीधा करें। ऐसा 2-3 बार करें। क्रमशः अभ्यास बढ़ाकर एक साथ 1 से 3 मिनट तक यह आसन कर सकते हैं।

सावधानीः यह आसन हर्निया व उच्च रक्तचाप में वर्जित है।





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कोनासन( konasana)

इस आसन में शरीर का आकार कोन (कोण) के समान हो जाता है, इसलिए इसे कोनासन कहते हैं।

लाभः कफ की शिकायत दूर होती है।
बौनापन दूर करने में मदद मिलती है।
कमर तथा पसलियों का दर्द ठीक हो जाता है।
स्वास्थ्य के साथ-साथ सौंदर्य भी बढ़ता है।

विधिः दोनों पैरों को डेढ़-दो फुट के अंतर पर रखते हुए सीधे खड़े हो जायें। अब दायें हाथ को नीचे दायें पैर के पंजे पर रखते हुए बायें हाथ को ऊपर ले जायें। दृष्टि ऊपर हाथ की ओर हो। इस स्थिति में 5-6 सैकेण्ड रहें।
मूल स्थिति में आकर इसी क्रिया को पुनः दूसरी ओर से करना चाहिए। ध्यान रहे कि कमर का हिस्सा यथासम्भव स्थिर रहे। इसे 4-6 बार करें।

सावधानीः कुछ लोग इस आसन को जल्दी-जल्दी करने का प्रयत्न करते हैं और बार-बार करते हैं। उसमें विशेष लाभ नहीं। इसलिए इसे धीरे-धीरे करें।




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शवासन(shavasana)


शवासन की पूर्णावस्था में शरीर के तमाम अंग एवं मस्तिष्क पूर्णतया चेष्टा रहित किये जाते हैं। यह अवस्था शव (मुर्दे) जैसी होने से इस आसन को शवासन कहा जाता है।
विधिः बिछे हुए आसन पर चित्त होकर लेट जायें। दोनों पैरों को परस्पर से थोड़े अलग कर दें। दोनों हाथ भी शरीर से थोड़े अलग रहें। इस प्रकार पैरों की ओर फैला दें। हाथ की हथेलियाँ आकाश की तरफ खुली रखें। सिर सीधा रहे। आँखें बन्द।
मानसिक दृष्टि से शरीर को पैर से सिर तक देखते जायें। पूरे शरीर को मुर्दे की तरह ढीला छोड़ दें। हर एक अंग को शिथिल करते जायें।
शरीर में सम्पूर्ण विश्राम का अनुभव करें। मन को भी बाह्या विषयों से हटाकर एकाग्र करें। बारी-बारी से हर एक अंग पर मानसिक दृष्टि एका्ग्र करते हुए भावना करें कि वह अंग अब आराम पा रहा है। मेरी सब थकान उतर रही है। इस प्रकार भावना करते-करते सब स्नायुओं को शिथिल होने दें। शरीर के एक भी अंग में कहीं भी तनाव (टेन्शन) न रहे। शिथिलीकरण की प्रक्रिया में पैर से प्रारम्भ करके सिर तक जायें अथवा सिर से प्रारम्भ करके पैर तक भी जा सकते हैं। अन्त में, जहाँ से प्रारम्भ किया हो वहीं पुनः पहुँचना चाहिये। शिथिलीकरण की प्रक्रिया से शरीर के तमाम अंगों का एवं ज्ञानतंतुओं को विश्राम की अवस्था में ला देना है।
शवासन की दूसरी अवस्था में श्वासोच्छोवास पर ध्यान देना है। शवासन की यही मुख्य प्रक्रिया है। विशेषकर, योग साधकों के लिए वह अत्यन्त उपयोगी है। केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिये प्रथम भूमिका पर्याप्त है।
इसमें श्वास और उच्छवास की नियमितता, दीर्घता और समानता स्थापित करने का लक्षय है। श्वास नियमित चले, लम्बा और गहरा चले, श्वास और उच्छवास एक समान रहे तो मन को एकाग्र करने की शक्ति प्राप्त होती है।
शवासन यदि ठीक ढंग से किया जाए तो नाड़ीतंत्र इतना शांत हो जाता है कि अभ्यासी को नींद आने लगती है। लेकिन ध्यान रहे, निन्द्रित न होकर जाग्रत रहना आवश्यक है।
अन्य आसन करने के बाद अंगों में जो तनाव (टेन्शन) पैदा होता है उसको शिथिल करने के लिये अंत में 3 से 5 मिनट तक शवासन करना चाहिए। दिनभर में अनुकूलता के अनुसार दो-तीन बार शवासन कर सकते हैं।
लाभः शवासन के द्वारा स्नायु एवं मांसपेशियों में शिथिलीकरण से शक्ति बढ़ती है। अधिक कार्य करने की योग्यता उसमें आती है। रक्तवाहनियों में, शिराओं में रक्तप्रवाह तीव्र होने से सारी थकान उतर जाती है। नाड़ीतंत्र को बल मिलता है। मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है।
रक्त का दबाव कम करने के लिए, नाड़ीतंत्र की दुर्बलता एवं उसके कारण होने वाले रोगों को दूर करने के लिये शवासन खूब उपयोगी है।







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