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ध्यान मुद्रा

लाभः स्नायुमंडल को बल मिलता है।
चंचल मन एकाग्र होता है।
शारीरिक व मानसिक तनाव दूर करने में मदद मिलती है।

विधिः पद्मासन या सुखासन में बैठें। बायीं हथेली पर दायीं हथेली रखें। दोनों हाथों के अँगूठे तर्जनी (अँगूठे के नजदीक की उँगली) से मिलायें। सिर, गर्दन और रीढ़ की हड्डी सीधी रेखा में रहें। आँखें और होंठ सहज रूप से बंद करें। मनःचक्षुशों के आगे अपने इष्टदेव, सदगुरुदेव की प्रतिमा को लायें।





0 commentTuesday, 15 January 2013

अपानवायु मुद्रा

अपानवायु मुद्राः अँगूठे के पास वाली पहली उँगली
को अँगूठे के मूल में लगाकर अँगूठे के अग्रभाग की
बीच की दोनों उँगलियों के अग्रभाग के साथ मिलाकर
सबसे छोटी उँगली (कनिष्ठिका) को अलग से सीधी
रखें। इस स्थिति को अपानवायु मुद्रा कहते हैं। अगर
किसी को हृदयघात आये या हृदय में अचानक
पीड़ा होने लगे तब तुरन्त ही यह मुद्रा करने से
हृदयघात को भी रोका जा सकता है।
लाभः हृदयरोगों जैसे कि हृदय की घबराहट,
हृदय की तीव्र या मंद गति, हृदय का धीरे-धीरे
बैठ जाना आदि में थोड़े समय में लाभ होता है।
पेट की गैस, मेद की वृद्धि एवं हृदय तथा पूरे
शरीर की बेचैनी इस मुद्रा के अभ्यास से दूर होती है।
 आवश्यकतानुसार हर रोज़ 20 से 30 मिनट तक इस
 मुद्रा का अभ्यास किया जा सकता है। 








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वायु मुद्रा

वायु मुद्राः तर्जनी अर्थात प्रथम उँगली को मोड़कर
ऊपर से उसके प्रथम पोर पर अँगूठे की गद्दी
स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।
लाभः हाथ-पैर के जोड़ों में दर्द, लकवा, पक्षाघात,
हिस्टीरिया आदि रोगों में लाभ होता है। इस मुद्रा
के साथ प्राण मुद्रा करने से शीघ्र लाभ मिलता है।







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प्राण मुद्रा

प्राण मुद्राः कनिष्ठिका, अनामिका और अँगूठे के ऊपरी भाग
को परस्पर एक साथ स्पर्श करायें। शेष दो उँगलियाँ
सीधी रहें।
लाभः यह मुद्रा प्राण शक्ति का केंद्र है। इससे शरीर
निरोगी रहता है। आँखों के रोग मिटाने के लिए व चश्मे
का नंबर घटाने के लिए यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक है।










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वरुण मुद्रा

           वरुण मुद्राः मध्यमा अर्थात सबसे बड़ी उँगली के मोड़ कर
उसके नुकीले भाग को अँगूठे के नुकीले भाग पर स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।
लाभः यह मुद्रा करने से जल तत्व की कमी के कारण होने
वाले रोग जैसे कि रक्तविकार और उसके फलस्वरूप होने वाले चर्मरोग व पाण्डुरोग (एनीमिया) आदि दूर हो जाते है।
 








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ज्ञान मुद्रा

ज्ञान मुद्राः तर्जनी अर्थात प्रथम उँगली को अँगूठे के
नुकीले भाग से स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ
सीधी रहें।
लाभः मानसिक रोग जैसे कि अनिद्रा अथवा अति
निद्रा, कमजोर यादशक्ति,क्रोधी स्वभाव आदि हो तो
यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक सिद्ध होगी। यह मुद्रा
करने से पूजा पाठ,ध्यान-भजन में मन लगता है।

इस मुद्रा का प्रतिदिन 30 मिनठ तक अभ्यास करना चाहिए।                                                                







           
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सूर्यमुद्रा


सूर्यमुद्राः अनामिका अर्थात सबसे छोटी उँगली के पास वाली उँगली को मोड़कर उसके नख के ऊपर वाले भाग को अँगूठे से स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।
लाभः शरीर में एकत्रित अनावश्यक चर्बी एवं स्थूलता को दूर करने के लिए यह एक उत्तम मुद्रा है।




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पृथ्वी मुद्रा

पृथ्वी मुद्राः कनिष्ठिका यानि सबसे छोटी उँगली को अँगूठे के नुकीले भाग से स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः शारीरिक दुर्बलता दूर करने के लिए, ताजगी व स्फूर्ति के लिए यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक है। इससे तेज बढ़ता है।





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शून्य मुद्रा

शून्य मुद्राः सबसे लम्बी उँगली (मध्यमा) को अंदपर की ओर मोड़कर उसके नख के ऊपर वाले भाग पर अँगूठे का गद्दीवाला भाग स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः कान का दर्द मिट जाता है। कान में से पस निकलता हो अथवा बहरापन हो तो यह मुद्रा 4 से 5 मिनट तक करनी चाहिए।





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लिंग मुद्रा

लिंग मुद्राः दोनों हाथों की उँगलियाँ परस्पर भींचकर अन्दर की ओर रहते हुए अँगूठे को ऊपर की ओर सीधा खड़ा करें।
लाभः शरीर में ऊष्णता बढ़ती है,खाँसी मिटती है और कफ का नाश करती है।




 

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