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Showing posts with label 1.आयुर्वेदिक जड़ी बूटीयाँ( Ayurvedic Herbs). Show all posts

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इलायची  के औषधीय प्रयोग 

इलायची औषधीय रूप से अति महत्त्वपूर्ण है | यह दो प्रकार की होती है – छोटी व बड़ी |

छोटी इलायची : यह सुंगधित, जठराग्निवर्धक, शीतल, मूत्रल, वातहर, उत्तेजक व पाचक होती है | इसका प्रयोग खाँसी, अजीर्ण, अतिसार, बवासीर, पेटदर्द, श्वास ( दमा ) तथा दाहयुक्त तकलीफों में किया जाता है


औषधीय प्रयोग –
  • - अधिक केले खाने से हुई बदहजमी एक इलायची खाने से दूर हो जाती है |
  • - धूप में जाते समय तथा यात्रा में जी मिचलाने पर एक इलायची मुँह में डाल दें |
  • - १ कप पानी में १ ग्राम इलायची चूर्ण डाल के ५ मिनट तक उबालें | इसे छानकर एक चम्मच शक्कर मिलायें | २ – २ चम्मच यह पानी २ – २ घंटे के अंतर से लेने से जी – मिचलाना, उबकाई आना, उलटी आदि में लाभ होता है |
  • - छिलके सहित छोटी इलायची तथा मिश्री समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें | चुटकीभर चूर्ण को १ -१ घंटे के अंतर से चूसने से सूखी खाँसी में लाभ होता है | कफ पिघलकर निकल जाता है |
  • - रात को भिगोये २ बादाम सुबह छिलके उतारकर घिस लें | इसमें १ ग्राम इलायची चूर्ण, आधा ग्राम जावित्री चूर्ण, १ चम्मच मक्खन तथा आधा चम्मच मिश्री मिलाकर खाली पेट खाने से वीर्य पुष्ट व गाढ़ा होता है |
  • - आधा से १ ग्राम इलायची चूर्ण का आँवले के रस या चूर्ण के साथ सेवन करने से दाह, पेशाब और हाथ-पैरों की जलन दूर होती है |
  • - आधा ग्राम इलायची दाने का चूर्ण और १-२ ग्राम पीपरामूल चूर्ण को घी के साथ रोज सुबह चाटने से ह्रदयरोग में लाभ होता है |
  • - छिलके सहित १ इलायची को आग में जलाकर राख कर लें | इस राख को शहद मिलाकर चाटने से उलटी में लाभ होता है |
  • - १ ग्राम इलायची दाने का चूर्ण दूध के साथ लेने से पेशाब खुलकर आती है एवं मूत्रमार्ग की जलन शांत होती है |
सावधानी : रात को इलायची न खायें, इससे खट्टी उकारें आती है | इसके अधिक सेवन से गर्भपात होने की भी सम्भावना रहती है |




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आयुर्वेदिक औषधियों के कुछ दुष्प्रभाव


  •       अदरख : अदरख या अदरक की प्रकृति गर्म होने के कारण जिन व्यक्तियों को ग्रीष्म ऋतु में गर्म प्रकृति का भोजन न पचता हो, कुष्ठ, पीलिया, रक्तपित्त, घाव, ज्वर, शरीर से रक्तस्राव की स्थिति, मूत्रकृच्छ, जलन जैसी बीमारियों में इसका सेवन नहीं करना चाहिए। खून की उल्टी होने पर और गर्मी के मौसम में अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए और यदि आवश्यकता हो तो कम से कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।

·         आंवला : आंवला प्लीहा (तिल्ली) के लिए हानिकारक होता है, लेकिन शहद के साथ सेवन करने से यह दुष्प्रभाव खत्म हो जाता है। शहद और बादाम का तेल आंवले के दोषों को दूर करता है तथा इसके गुणों में सहायक होता है।

 

·         धनिया : सावधान धनिया याददाश्त को कमजोर करता है।

·         टमाटर : सावधान टमाटर पथरी, अम्लपित्त, आमवात, शीतपित्ती, सूजन, संधिवात के रोगियों के लिए हितकर नहीं है

·         टमाटर : सावधान जिनके शरीर में गर्मी की मात्रा अधिक हो, मांसपेशियों में दर्द रहता हो, तेज खांसी चलती हो, पेट आंतों व गर्भाशय में उपदंश हो, उन्हें टमाटर से परहेज करना चाहिए, न ही टमाटर का सूप आदि पीना चाहिए।

·         पालक : सावधान पालक को पनीर जैसे मिल्क प्रोडक्ट के साथ नहीं बनाना चाहिए।

·         पालक : पालक की भाजी वायुकारक है, इसलिए वर्षा के मौसम में इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

·         गाजर : सावधान इस बात का ख्याल रखें- आप डाइट में गाजर का ओवर डोज न लें। वरना आपको कैरोटेनीमिया हो सकता है। इसमें स्किन येलो हो जाती है। 

·         गाजर : सावधान गाजर के भीतर का पीलापन भाग (डंठल) नहीं खाना चाहिए। क्योंकि, वह अत्यधिक गरम होता है। जिसके सेवन से छाती में जलन होती है।

·         गाजर : सावधान गाजर के गाजर के बीज गरम होते हैं। अत: गर्भवती महिलाओं को उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।

·         गाजर : सावधान गाजर और नींबू का रस मिला कर पीने से दस्त आना बंद हो जाते हैं। इस कारन ये अतिसार (दस्त) की दवाई भी है! अत: जिनको दस्त नहीं आने की शिकायत रहती हो, उन्हें गाजर और नीम्बू के रस को मिलाकर नहीं लेना चाहिए!

·         गाजर : गाजर का जूस सभी लोगो को पीना चाहिए, लेकिन जिन लोगो को शुगर की बिमारी है उन्हें गाजर का जूस नहीं पीना चाहिए!
·         दूब : दूब का सामान्य से अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह आमाशय को नुकसान पहुंचा सकती है और कामशक्ति में कमी ला सकती है। हरी दूब का अधिक मात्रा में सेवन करने से स्त्रियों को उल्टी आने लगती है।

·         पत्तागोभी : पत्तागोभी का रस एक सीमित मात्रा में (एक-डेढ़ कप) ही लेना चाहिए। नवीन शोधों से ज्ञात हुआ है कि अधिक मात्रा में लिया गया पत्तागोभी का रस थाइराइड ग्रंथि के स्राव (बहना) को बढ़ा देता है जो हानिकारक भी हो सकता है।

·         बथुआ : पथरी के रोगीओं को बथुए के साग का सेवन नहीं करना चाहिये, क्योंकि इसमें लौह तत्व अधिक होने के कारण  पथरी का निर्माण होता है|

·         सोयाबीन : गर्भधारण करने वाली स्त्रियों को सोयाबीन का प्रयोग बिलकुल नही करना चाहियें, क्योंकि इससे जन्मने वाली सन्तान पर बुरा असर पड़ता है।



 
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तिल से उपचार (Benefits Of Sesame Seed)

तिल कई प्रकार के होते हैं किन्तु हमारी पहचान सफ़ेद तिल और काले तिल से है . मकर संक्रांति के पुण्य अवसर पर उड़द की खिचडी और तिल के लड्डू खाने का चलन हिन्दुस्तान में सदियों- सदियों से चला आ रहा है. तिल के लड्डू के अतिरिक्त तिल के तेल का चलन भी है जो हम सिर में लगाते हैं जो विद्यार्थियों के लिए अति उत्तम माना गया है . बस तिल का तीसरा कोई प्रयोग चलन में नहीं है . आइये आज अपने ज्ञान में हम वृद्धि करें .विश्वास कीजिए जब आप तिल के गुणों के बारे में जान लेंगे तो फिर सिर्फ मकर संक्रांति में ही नहीं पूरे वर्ष तिल के गुण गायेंगे और लड्डू खायेंगे.

तिल विशेषतः काले तिल में कार्बोहाईड्रेट ,प्रोटीन और कैल्शियम की प्रचुर मात्रा होती है .इसीलिए ये शरीर के लिए अमृत है.

दाँत- काले तिल को अगर आप २५ से ३० ग्राम रोज चबाकर खायेंगे तो दाँत आपके बेहद मजबूत हो जायेंगे. अगर दाँत में कीड़े लग रहे हों तो तिल को पानी में ४ घंटे भिगा दीजिये फिर छान कर उसी पानी से मुंह को भरिये और १० मिनट रुके रहिये .फिर पानी उगल दीजिये, चार पांच बार इसी तरह कुल्ला कीजिये, घाव, पायरिया सभी परेशानिया ख़त्म.

मोटापा- अगर पेट निकल रहा हो तो सुबह शाम एक चम्मच भर के तिल का तेल पी जाएं .

महिलाओं के लिए- लड़कियों और महिलाओं को तो प्रतिदिन कम से कम १० ग्राम तिल चबा चबा कर खाना चाहिए ,इससे उन्हें मासिक चक्र के समय होने वाले दुःख दर्द और अनियमितता से तो मुक्ति मिलेगी ही उनका गर्भाशय भी मजबूत और बीमारी रहित हो जाएगा .वे स्वस्थ और सुन्दर बच्चे पैदा करने में सक्षम होंगी.

बालों के लिए - तिल का तेल प्रतिदिन सिर में लगाने से मेधा शक्ति बढ़ती है और बाल भी सुन्दर बने रहते हैं. अपने इसी गुण के कारण तिल का तेल विद्यार्थियों के लिए अति पौष्टिक और उत्तम माना गया है.

ल्यूकोरिया- अक्सर महिलायें इस बीमारी से त्रस्त रहती हैं और किसी को बताती भी नहीं , उनका स्वास्थ्य भी इसकी वजह से गिरता चला जाता है.उन्हें रुई को तिल के तेल में भिगा कर अपने जननांगो में रखना चाहिए ताकि वे इस बीमारी से मुक्त हो जाएं.

बवासीर- तिल के लड्डू सुबह ,दोपहर , को खाइए . इस मुसीबत से पीछा छुडाइये. या तिल को पीस कर चटनी बनाएं और मक्खन मिला कर खा जाएं .

खांसी- तिल का काढा बनाइये, शक्कर मिला कर पीजिये. सारा कफ ख़त्म हो जाएगा.कम से कम ४ बार.

मोच में - तिल और महुए को एक साथ पीसिये और जहां मोच आई हो वहाँ बाँध दीजिये . फिर देखिये जादुई असर.
अगर आप बूढ़े नहीं होना (दिखना) चाहते तो प्रतिदिन शरीर में तिल के तेल की मालिश कीजिए ,न स्किन सिकुड़ेगी न झुर्रियां पड़ेंगी.

गर्भाशय - अगर किसी वजह से या ठंड से गर्भाशय में पीड़ा हो रही है तो तिल को पीस कर उसमें थोड़ा तिल का तेल मिलाइए और गर्म कीजिए फिर नाभि के नीचे लेप कर दीजिये. जो दर्द तमाम पेनकिलर से नहीं गया वह चुटकी बजाते ही गायब हो जाएगा. अगर बच्चेदानी में खून जम गया हो तो आधा आधा चम्मच तिल का पावडर दिन में चार बार खिलाएं . गर्भ और गर्भिणी दोनों को आराम महसूस होगा और खून बिखर जाएगा.




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