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तन-मन से निरोग-स्वस्थ व तेजस्वी संतान-प्राप्ति के नियम


गृहस्थ जीवन की सफलता उत्तम संतान की प्राप्ति में मानी जाती है किन्तु मनुष्य यह नहीं जानता कि कुछ नियमों का पालन उसे दिव्य, तेजस्वी एवं ओजस्वी संतान प्रदान करने में सहायक होता है। अगर निम्नांकित नियमों को जानकर उसका पालन किया जाये तो उत्तम, स्वस्थ संतान की प्राप्ति हो सकती है।
ऋतुकाल की चौथी, छठी, आठवीं और बारहवीं रात्रि में स्त्रीसंग करके पुरुष दीर्घायुवाला पुत्र उत्पन्न करता है। पुत्र की इच्छा रखनेवाली स्त्री को इस रात्रि में लक्ष्मणा (हनुमान बेल) की जड़ को दूध में घिसकर उसकी दो तीन बूँदे दायें नथुने में डालनी चाहिए।
ऋतुकाल की पाँचवी, नवमी और ग्यारहवीं रात्रि में स्त्रीसंग करके गुणवान कन्या उत्पन्न करता है किन्तु सातवीं रात्रि में स्त्रीसंग करने से दुर्भांगी कन्या उत्पन्न होती है।
ऋतुकाल की तीन रात्रियों में, प्रदोष काल में, अमावस्या, पूर्णिमा, ग्यारस अथवा ग्रहण के दिनों में एवं श्राद्ध तथा पर्व दिनों में संयम न रखने वाले गृहस्थों के यहाँ कम आयुवाले, रोगी, दुःख देने वाले एवं विकृत अंगवाले बच्चों का जन्म होता है। अतः इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।
तेजस्वी पुत्र की इच्छा रखनेवाले स्त्री-पुरुष दोनों को उपरोक्त बातों का ध्यान रखकर शैया पर निम्नलिखित वेदमंत्र पढ़ना चाहिए।
अहिरसि, आयुरसि, सर्वतः प्रतिष्ठासि धाता।
त्वा दधातु विधाता त्वा दधातु ब्रह्मवर्चसा भवेदिति।।
ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाऽश्विनौ।
भगोऽथ मित्रावरु्णौ वीरं दधतु मे सुतम्।।




गर्भवती स्त्री द्वारा रखने योग्य सावधानी


उकड़ू बैठना, ऊँचे नीचे स्थान एवं कठिन आसन में बैठना, वायु, मल-मूत्र का वेग रोकना, शरीर जिसके लिए अभ्यस्त न हो ऐसा कठिन व्यायाम करना, तीखे, गरम, खट्टे, दही एवं मावे की मिठाइयों जैसे पदार्थों का अति सेवन करना, गहरी खाई अथवा ऊँचे जलप्रपात हों ऐसे स्थलों पर जाना, शरीर अत्यंत हिले-डुले ऐसे वाहनों में मुसाफिरी करना, हमेशा चित्त सोना-ये सब कार्य और व्यवहार गर्भ को नष्ट करने वाले हैं अतः गर्भिणी को इनसे बचना चाहिए।
जिनका गर्भ गिर जाता हो वे माताएँ गर्भरक्षक मंत्र (जो कि मंत्र की इच्छुक माताओं को ध्यान योग शिविर में दिया जाता है।) पढ़ते हुए एक काले धागे पर 21 गाँठे लगायें व 21 बार गर्भरक्षक मंत्र पढ़कर पेट पर बाँधें। इससे गर्भ की रक्षा होती है।
जो गर्भिणी स्त्री खुले प्रदेश में, एकांत में अथवा हाथ-पैर को खूब फैलाकर सोने के स्वभाव वाली हो अथवा रात्रि के समय में बाहर घूमने के स्वभाववाली हो तो वह स्त्री उन्मत्त-पागल संतान को जन्म देती है।
लड़ाई-झगड़े, हाथापाई एवं कलह करने के स्वभाववाली स्त्री अपस्मार या मिर्गी के रोगवाली संतान को जन्म देती है।
यदि गर्भावस्था में मैथुन का सेवन किया जाये तो खराब देहवाली, लज्जारहित, स्त्रीलंपट संतान उत्पन्न होती है। गर्भावस्था में शोक, क्रोध एवं दुष्ट कर्मों का त्याग करना चाहिए।




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दुग्धवर्धक कुछ आसान प्रोयोग

पहला प्रयोगः खजूर, खोपरा, दूध, मक्खन, घी, शतावरी, अमृता आदि खाने से अथवा मक्खन मिश्री के साथ चने खाने से अथवा गाय के दूध में चावल पकाकर खाने से अथवा रोज 1-1 तोला सौंफ दो बार खाने से दूध बढ़ता है।

दूसरा प्रयोगः अरण्डी के पत्तों को पानी में उबालकर उस पानी को ऊपर से स्तनों पर डालें एवं उसमें ही उबले हुए पत्तों को छाती पर बाँधने से सूखा हुआ दूध भी उतरने लगता है।

दूध बंद करने के लिएः कुटज छाल का 2-2 ग्राम चूर्ण दिन में तीन बार खाने से दूध आना बंद हो जाता है।




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प्रसव पीड़ा निवारक कुछ आसान प्रोयोग और मन्त्र


पहला प्रयोगः प्रसूति के समय ताजे गोबर (1-2 घण्टे के भीतर का) को कपड़े में निचोड़कर एक चम्मच रस पिला देने से प्रसूति शीघ्र हो जाती है।

दूसरा प्रयोगः तुलसी का 20 से 50 मि.ली. रस पिलाने से प्रसूति सरलता से हो जाती है।

तीसरा प्रयोगः पाँच तोला आँवले को 20 तोला पानी में खूब उबालिये। जब पानी 8 तोला रह जाये तब उसमें 10 ग्राम शहद मिलाकर देने से बिना किसी प्रसव पीड़ा के शिशु का जन्म होता है।

चौथा प्रयोगः नीम अथवा बिजौरे की जड़ कमर में बाँधने से प्रसव सरलता से हो जाता है। प्रसूति के बाद जड़ छोड़ दें।
मंत्रः ॐ कौंरा देव्यै नमः। ॐ नमो आदेश गुरु का.... कौंरा वीरा का बैठी हात... सब दिराह मज्ञाक साथ.... फिर बसे नाति विरति.... मेरी भक्ति... गुरु की शक्ति.... कौंरा देवी की आज्ञा।
प्रसव के समय कष्ट उठा रही स्त्री को इस मंत्र से अभिमंत्रित किया हुआ जल पिलाने से वह स्त्री बिना पीड़ा के बच्चे को जन्म देती है।





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गर्भवती स्त्री के लिए पथ्य आहार-विहार

गर्भधारण होने के पश्चात् ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना चाहिए। सत्साहित्य का श्रवण एवं अध्ययन, सत्पुरुषों, आश्रमों एवं देवमंदिरों के दर्शन करना चाहिए एवं मन प्रफुल्लित रहे ऐसी सत्प्रवृत्तियों में रत रहना चाहिए।
गर्भधारण के पश्चात् प्रथम मास बिना औषधि का ठंडा दूध सुबह-शाम पियें। आहार प्रकृति के अनुकूल एवं हितकर करें। दूध भात उत्तम आहार है। दूसरे मास में मधुर औषधि जैसे कि जीवंति, मुलहठी, मेदा, महामेदा, सालम, मुसलीकंद आदि से संस्कारित सिद्ध दूध योग्य मात्रा में पियें तथा आहार हितकर एवं सुपाच्य ले तथा आहार हितकर एवं सुपाच्य लें।
तीसरे मास में दूध में शहद एवं घी (विमिश्रण) डालकर पिलायें तथा हितकर एवं सुपाच्य आहार दें।
चौथे मास में दूध में एक तोला मलाई डालकर पिलायें तथा हितकर एवं सुपाच्य आहार दें।
पाँचवें मास में दूध एवं घी मिलाकर पिलायें।
छठे एवं सातवें मास में दूसरे महीने की तरह औषधियों से सिद्ध किया गया दूध दें एवं घी खिलायें।
आठवें एवं नवें मास में चावल को दूध में पकाकर, घी डालकर सुबह-शाम दो वक्त खिलायें।
इसके अलावा वातनाशक द्रव्यों से सिद्ध तेल के द्वारा कटि से जंघाओं तक मालिश करनी चाहिए। पुराने मल की शुद्धि के लिए निरुद बस्ति एवं अनुवासन बस्ति का प्रयोग करना चाहिए। नवें महीने में उसी तेल का रूई का फाहा योनि में रखना चाहिए।
शरीर में रक्त बनाने के लिए प्राणियों के खून से बनी ऐलोपैथिक केप्सूल अथवा सिरप लेने के स्थान पर सुवर्णमालती, रजतमालती एवं च्यवनप्राश का रोज सेवन करना चाहिए एवं दशमूल का काढ़ा बनाकर पीना चाहिए।




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गर्भस्थापक और गर्भरक्षा करने वाले अनुभूत प्रयोग

गर्भधारण

पहला प्रयोगः शिवलिंगी के 9-9 बीज दूध या पानी में घोंटकर प्रातःकाल खाली पेट मासिक के पाँचवें दिन से चार दिन तक लेने से लाभ होता है।
दूसरा प्रयोगः अश्वगंधा के काढ़े में घृत पकाकर यह घृत एक तोला मात्रा में ऋतुकाल में स्त्री यदि सेवन करे तो उसे गर्भ रहता है। (एक किलो अश्वगंधा के बोरकूट चूर्ण को 16 लीटर पानी में उबालें। चौथाई भाग अर्थात् 4 लीटर पानी रह जाने पर उसमें 1 किलो घी डालकर उबालें। जब केवल घी बचे तब उसे उतारकर डिब्बे में भर लें। यही घृत पकाना है।)
तीसरा प्रयोगः दूध के साथ पुत्रजीवा की जड़, बीज अथवा पत्तों के एक तोला चूर्ण को लेने से, ब्रह्मचर्य का पालन करने से, तीन महीने तक यह प्रयोग करने से बाँझ को भी संतान प्राप्ति हो सकती है। जिनके बालक जन्मते ही मर जाते हों उनके लिए भी यह एक अकसीर प्रयोग है। पुत्रजीवा के बीजों की माला पहनने से भी लाभ होता है।

गर्भस्थापक

रात को किसी मिट्टी के बर्तन में 25 ग्राम अजवायन, 25 ग्राम मिश्री 25 ग्राम पानी में डुबाकर रखें। सुबह उसे ठण्डाई की नाईं पीसकर पियें।
भोजन में बिना नमक की मूँग की दाल व रोटी खायें। यह प्रयोग मासिक धर्म के पहले दिन से लेकर आठवें दिन तक करना चाहिए।

गर्भरक्षा

प्रथम प्रयोगः जिस स्त्री को बार-बार गर्भपात को जाता हो उसकी कमर में धतूरे की जड़ का चार उँगल का टुकड़ा बाँध दें। इससे गर्भपात नहीं होगा। जब नौ मास पूर्ण हो जाय तब जड़ को खोल दें।
दूसरा प्रयोगः जौ के आटे को एवं मिश्री को समान मात्रा में मिलाकर खाने से बार-बार होने वाला गर्भपात रुकता है।



सुन्दर बालक के लिए

नारियल का पानी पीने से अथवा नौ महीने तक रोज बबूल के 5 से 10 ग्राम पत्ते खाने से गर्भवती स्त्री गौरवर्णीय बालक को जन्म देती है। फिर चाहे माता-पिता श्याम ही क्यों न हों।


गर्भिणी की उलटी


बेल का 5 ग्राम गूदा एवं धनिया का 50 मि.ली. पानी मिलाकर पीने से अथवा कपूरकाचली के 2 ग्राम चूर्ण को 10 मि.ली. गुलाबजल में मिश्रित करके लेने से गर्भिणी की उल्टी शांत होती है।


गर्भिणी के पेट की जलन


10-15 मुनक्के का सेवन करने से अथवा बकरी के 100 से 200 मि.ली. दूध में 10 से 20 ग्राम सोंठ पीसकर लेने से लाभ होता है।






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स्त्री-रोग(Female-Diseases)



श्वेत प्रदर (Leucorrhoea)

 

श्वते प्रदर में पहले तीन दिन तक अरण्डी का 1-1 चम्मच तेल पीने के बाद औषध आरंभ करने पर लाभ होगा। श्वेतप्रदर के रोगी को सख्ती से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

पहला प्रयोगः आश्रम के आँवला-मिश्री के 2 से 5 ग्राम चूर्ण के सेवन से अथवा चावल के धोवन में जीरा और मिश्री के आधा-आधा तोला चूर्ण का सेवन करने से लाभ होता है।

दूसरा प्रयोगः पलाश (टेसू) के 10 से 15 फूल को 100 से 200 मि.ली. पानी में भिगोकर उसका पानी पीने से अथवा गुलाब के 5 ताजे फूलों को सुबह-शाम मिश्री के साथ खाकर ऊपर से गाय का दूध पीने से प्रदर में लाभ होता है।

तीसरा प्रयोगः बड़ की छाल का 50 मि.ली. काढ़ा बनाकर उसमें 2 ग्राम लोध्र चूर्ण डालकर पीने से लाभ होता है। इसी से योनि प्रक्षालन करना चाहिए।

चौथा प्रयोगः जामुन के पेड़ की जड़ों को चावल के मांड में घिसकर एक-एक चम्मच सुबह-शाम देने से स्त्रियों का पुराना प्रदर मिटता है।

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रक्तप्रदर (Menorrhagia)

 

पहला प्रयोगः आम की गुठली का 1 से 2 ग्राम चूर्ण 5 से 10 ग्राम शहद के साथ लेने से या एक पके केले में आधा तोला घी मिलाकर रोज सुबह-शाम खाने से रक्तप्रदर में लाभ होता है।

दूसरा प्रयोगः 10 ग्राम खैर का गोंद रात में पानी में भिगोकर सुबह मिश्री डालकर खाने से अथवा जवाकुसुम (गुड़हल) की 5 से 10 कलियों को दूध में मसलकर पिलाने से रक्तप्रदर में लाभ होता है।

तीसरा प्रयोगः अशोक की 1-2 तोला छाल को अधकूटी करके 100 ग्राम दूध एवं 100 ग्राम पानी में मिलाकर उबालें। केवल दूध रहने पर छानकर पीने से रक्तप्रदर में लाभ होता है।

चौथा प्रयोगः गोखरू एवं शतावरी के समभाग चूर्ण में से 3 ग्राम चूर्ण को बकरी या गाय के सौ ग्राम दूध में उबालकर पीने से रक्तप्रदर में लाभ होता है।

पाँचवाँ प्रयोगः कच्चे केलों को धूप में सुखाकर उसका चूर्ण बना लें। इसमें से 5 ग्राम चूर्ण में 2 ग्राम गुड़ मिलाकर रक्तप्रदर की रोगिणी स्त्री को खिलाने से लाभ होगा। इस चूर्ण के साथ कच्चे गूलर का चूर्ण समान मात्रा में मिलाकर प्रतिदिन प्रातः-सायं 1-1 तोला सेवन करने से ज्यादा लाभ होता है।

सावधानीः उपचार के दौरान लाभ न होने तक आहार में दूध व चावल ही लें। बुखार हो तो उन दिनों उपवास करें।

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मासिक पीड़ा

 

कन्यालोहादिवटी की दो-दो गोलियां सुबह-शाम लें।

मासिक अधिक होने पर

 

काली मिट्टी की पट्टी पेट पर बाँधने से, पीपल के पाँच पत्ते रोज तीन बार खाने से एवं बबूल के 5 से 10 ग्राम गोंद का सेवन करने से लाभ होता है।

मासिक बंद होने पर

अरण्डी के पत्तों पर थोड़ा सा अरण्डी का ही थोडा सा गर्म तेल लगाकर पेट पर बाँधने से एवं तिल के 50 मि.ली. काढ़े में सोंठ, काली मिर्च, लेंडीपीपर, हींग और भारंग की जड़ का 3 ग्राम चूर्ण डालकर पीने से लाभ होता है।






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