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अच्युताय गौझरण वटी(Achyutaya Gaujaran Ghan Tablet)



लाभ : कफ के रोग, वायु के
रोग, पेट के रोग, अग्निमांध
घुटनोका का दर्द, अजीर्ण, आफरा
संग्रहनी,लीवर के रोग, पीलिया
(कमला), प्लीहा के रोग,डायबिटीज,
बहुमुत्रता,शोथ,जोड़ोका का दर्द,कैंसर,
गठिया, बदन दर्द, कृमि, बच्चों
के रोग, कान के रोग, टी.बी,स्त्री रोग,
 सिरदर्द आदि में उपयोगी
उपयोग : 2 से 4 गोली पानी के
साथ दिन में दो बार ले सकते है ।

(1)Product Name :- Achyutaya Gaujaran Ghan Tablet
(2)Quantity :- 60 g.
(3)Direction For Use :- 2 to 3 tab. twice a day ( Dose depends upon age, weight & illness of the individuals). OR as directed by physician.
        Note :- Do not take milk 2 hr. before & 2 hr. after medicine.
 (4)Benefits :- It is very useful in kaphavataj vikar, viz. cough, asthma, oedema, inflammation, tumour, filariaa, prameha(diabetes), aamvat (rheumatic disorder), osteoarthritis, obesity, sciatica etc.
               Also useful in indigestion, tympanitis, sprue, worms, constipation, anaemia, jaundice, gallstones, hepatosplenomegaly, ascitis, urinary calculi, acute & chronic renal failure, benign enlargement of prostate, heart disordes, skin disorders etc.
(5)Main Ingredients :- Concentrated cow urine (gaujaran ghan), Terminalia chebula (Harad), Cassia angustifolia (Sanay) etc.











0 commentTuesday, 12 March 2013

हिंगादि हरड़ चूर्ण(Hingadi Harad Churna)


गैस, अम्लपित्त, कब्जियत, आफरा, डकार, सिरदर्द, अपचन, मंदाग्नि, अजीर्ण एवं पेट के अन्य छोटे-मोटे असंख्य रोगोंके अलावा चर्मरोग, लीवर के रोग, खांसी, सफेद दागकील-मुहांसे, वायुरोग, संधिवातहृदयरोग, बवासीर, सर्दी, कफ, किडनी के रोग एवं स्त्रियों के मासिकधर्म संबंधी रोगों मे लाभ होता है ।


(1)Product Name :- Hingadi Harad Churna
(2)Quantity :- 100 g.
(3)Direction For Use :- 1 to 2 g. twice a day after meal                ( Dose depends upon age, weight & illness of the individuals). OR as directed by physician.
        Note :- Do not take milk 2 hr. before & 2 hr. after medicine.
(4)Benefits :- It increases apetite & regulates peristalsis.
              Useful in gas trouble, constipation, headache, indigestion, loss of apetite, etc.
              Also useful in skin disease, liver disease, acne, rheumatoid arthritis, heart disease, piles etc.

(5)Main Ingredients:- Ferula Narthex(hing), Terminalia chebula(harad) & other medicine that increases digestive power.











 






0 commentSunday, 10 March 2013

अच्युताय अदरक युक्त आँवला शरबत(Achyutaya Amla  Sharbat)


Benefits :- इसके नियमित सेवन से यकृत (लीवर) एवं आँतों की कार्यक्षमता बढ़कर अन्न का पाचन ठीक से होता है! यह भूख को बढ़ाता है और वायु का अनुलोमन करता है! अतः अरुचि (Anorexia), अम्लपित (Acidity) , पेट फूलना (gas), कब्ज (constipation) , कृमिरोग आदि पेट के अनेक रोगों में में लाभदायी है! इसके अतिरिक्त यह ह्रदय, मस्तिष्क एवं बालों के लिए भी हितकर है!
इससे शरीर पुष्ट एवं बलवान बनता है और चेहरे की कांति बढ़ती है! यह रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाकर ऋतु- परिवर्तनजन्य रोगों से रक्षा करता है! इसके सेवन से दिनभर शरीर में उत्साह, प्रसन्न्ता एवं स्फूर्ति बनी रहती है!

Direction For Use :- २०-३० मि. ली.शरबत पानी में मिलाकर लें !
Main Ingredients :- आंवला , अदरक










0 commentWednesday, 6 March 2013




अच्युताय लिवर टोनिक सिरप(Achyutaya Liver Tonic Syrup)


सभी प्रकार के यकृत,
खून की कमी, पीलिया, रक्त-
विकार, कमजोरी, भूख न
लगना, अरुचि, कब्ज, पेट दर्द
तथा गैस में अत्याधिक लाभप्रद मात्रा: 1 से 2 चम्मच सुबह-शाम 

(1)Product Name :- Achyutaya Liver Tonic Syrup
(2)Quantity :- 100 ml.
(3)Direction For Use :- 1 to 2 t.s.f. once or twice a day ( Dose depends upon age, weight & illness of the individuals). OR as directed by physician.
(4)Benefits :-  For all types of liver disease, anaemia, jaundice, blood impurities, weakness, constipation & gas trouble.

(5)Main Ingredients :- Aloe Barbedensis(gwarpatha), picrorrhiza kurro(kutki), Tinospora cordifolia(Giloy) etc







 
0 commentFriday, 1 March 2013



अच्युताय लिवर टोनिक टेबलेट(Achyutaya Liver tonic tablet)



 सभी प्रकार के यकृत विकार ,खून की कमी ,पीलीया, रक्त विकार ,गैस ,कमजोरी ,अरुचि ,भूख न लगना,पेट दर्द  तथा गैस में अत्यधिक लाभप्रद .

(1)Product Name :- Achyutaya Liver Tonic Tablet
(2)Quantity :- 40 g.
(3)Direction For Use :- 1 to 2 tab. once or twice a day ( Dose depends upon age, weight & illness of the individuals). OR as directed by physician.
(4)Benefits :-  For all types of liver diseases, anaemia, jaundice, blood impurities, weakness, constipation & gas trouble etc.
(5)Main Ingredients :- Aloe Barbedensis(gwarpatha), picrorrhiza kurro(kutki), Tinospora cordifolia(Giloy) etc.






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अच्युताय घृतकुमारी रस(Achyutaya Aloevera Juice)



त्रिदोष नाशक ,जठराग्नि वर्धक ,यकृत (लिवर)के लिए यह वरदान स्वरूप है ।
विविध त्वचा विकार ,पीलिया ,रक्ताल्पता ,कफ ज्वर ,खांसी ,तिल्ली की वृद्धि नेत्र व स्त्री रोग ,विसर्प ,वातरक्त (गाऊट),जलोदर ,सुजन ,आन्तरिक जलन आदि में लाभ दायी है  ।


Benefits :- Aloe-Vera juice works as a liver-tonic. Balances all the three doshas & improves appetite. Useful in liver dysfunction, jaundice, anaemia, hepatomegaly, splenomegaly, ascites, generalized edema(anasarca) etc. It purifies the blood therefore useful in skin diseases, herpes, Internal hotness, gout, menstrual irregularity, pain during menses(dysmenorrhea), eye diseases etc.
Direction For Use :-
  • For elder people :- 10 to 20 ml/day.
  • For children :- 5 to 10 ml/day.
OR as directed by physician. Note :- Do not take milk 2 hr. before & 2 hr. after medicine.
Main Ingredients :- Aloe barbedensis(gwarpatha).







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अच्युताय गोझरण अर्क(Achyutaya Gaujaran Ark)



 कफ  के  रोग (जैसे सर्दी खांसी आदि)वायु के रोग ,पेट के रोग ,गैस ,अग्निमान्ध, गठिया ,घुटने का दर्द,पीलिया लीवर के  रोग,प्लीहा के रोग ,बहुमूत्रता,शोथ ,जोड़ों का दर्द ,बच्चों के रोग ,कान के रोग ,सर में  रुसी ,सिरदर्द आदि में उपयोगी  ।

(1)Product Name :- Gaujaran Ark
(2)Quantity :- 500 ml.
(3)Direction For Use :- 10 to 20 ml. once or twice a day on empty stomach with water. OR as directed by physician.       Note :- Do not take milk 2 hr. before & 2 hr. after medicine.
(4)Benefits :- It is very useful in kaphavataj vikar, viz. cough, asthma, edema, inflammation, tumour, filaria, prameha(diabetes), aamvat (rheumatic disorder), ankylosing spondylitis, osteoarthritis, obesity, sciatica etc.
               Also useful in indigestion, tympanitis, sprue, worms, constipation, anaemia, jaundice, gallstones, hepatosplenomegaly, ascitis, urinary calculi, acute & chronic renal failure, benign enlargement of prostate, heart disordes, skin disorders etc.
(5)Main Ingredients :-  Indian cow’s urine (gaujaran). 







0 commentSaturday, 23 February 2013
पीलिया का सरल और अनुभूत उपचार

एक नग खाने का बंगला पान (खाने में चरपरा, तीखा लगता है) लेकर इस पान को चूना और कत्था लगाएं । अब इस पान में अंक (अकौंना, मदार जामुनी फूल वाला) का दूध 3-4 बूँद डालकर प्रात: खा लें | इससे पीलिया शर्तिया ठीक हो सकता है । यदि आंख की सफेद पुतली, ऊपरी आधी-चौड़ाई सतह ही पीली हुई हो तो 3 दिन यह पान खाने पर पीलिया एकदम ठीक हो जाता है । पूरी सफेद पुतली होने पर ठीक होने के लिये 5 दिन लग जाते है ।

आक पत्ते का दूध प्राप्त करने की विधि - 1. सूर्योदय से पूर्व आक का पत्ता तोड़ कर दूध निकाल लेना चाहिये । 2. आक का दूध चिकना होता है । और आंखों के लिये अत्यंत हानिकारक होता है ।

सावधानी- अत: पत्ते से दूध निकालते समय हाथ किसी प्रकार से आंखों में नहीं लगना चाहिये अन्यथा आंख पर गलती से भी आक का दूध लग जाने से आंख खराब हो सकती है । बच्चों से कभी आक का पत्ता, फूल तोड़ने को नहीं कहना चाहिये । 3. आक के पत्ते के पीछे सफेद रेशे रहते है । इन्हें पोंछकर साफ कर लेना चाहिये न पोंछने पर उल्टी हो सकती है । बरसात एवं बादल के समय पत्तों पर पीछे पीले-लाल रंग के कीड़े रहते हैं उन्हें हटा देना चाहिए ।
                       

            गन्ने का रस पीलिया रोग में बड़ा लाभ-प्रद है यह पीलिया की जड़ काट देता है ।



पीलिया के कारण

जॉण्डिस या पीलिया अनेक कारणों से होता है। शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन प्रोटीन होता है जो कि रक्त में ऑक्सीजन वाहक का कार्य करता है। रक्त की लाल रक्त कोशिकाएं निरंतर बनती रहती हैं और पुरानी नष्ट होती रहती हैं। लाल रक्त कोशिकाओं से टूटने से हीमोग्लोबिन निकलकर बिलिरूबिन लवण में परिवर्तित हो जाता है, वहां से बिलिरूविन लिवर में पहुंचकर रासायनिक परिवर्तन मल या पेशाब के माध्यम से शरीर से निकलता रहता है। यदि लाल रक्त कोशिकाओं की टूटने की प्रक्रिया तेजी से होती रहती है या लीवर के रोगों में बिलिरूबिन का स्तर रक्त में बढ़ जाता है, रक्त में जब बिलिरूबिन का स्तर 0.8 मि.ग्रा. प्रति 100 मि.ली. से बढ़ जाता है तो यह दशा जॉण्डिस कहलाती है, पर आंखा तथा त्वचा का पीला रंग रक्त में बिलिरूबिन की मात्रा 2 से 2.5 मि.ग्रा. तक बढ़ने पर ही दिखाई पड़ता है।

लाल रक्त कणिकाओं के तेजी से टूटने के परिणामस्वरूप होने वाले पीलिया को ‘हिमोलिटिक जॉण्डिस’ कहते हैं। यह दशा असामान्य लाल रक्त किणकाएं या हीमोग्लोबिन की उपस्थिति के कारण कुछ विष या दवाओं के प्रभाव से हो सकती है। इस रोग में मूत्र का रंग सामान्य और मल गहरा भूरे रंग का होता है। जांच करने पर लीवर की कार्यशक्ति सामान्य मिलती है। दूसरी तरह का पीलिया लीवर रोगों जैसे वायरल हिपेटाइटिस, सिरहोसिस इत्यादि में लीवर में बिलिरूबिन का युग्गम बाधित हो जाने के फलस्वरूप होता है, इस दशा को ‘हिपेटिक जॉण्डिस’ कहा जाता है। इन रोगों में पेशाब का रंग गहरा पीला, मल चिकना और हल्के रंग का होता है। जांच करने के लिए लीवर की कार्यक्षमता कम मिलती। तीसरी दशा में पित्त के निकास मार्ग में पत्थरी या कैंसर या संक्रमण के कारण, बाधा आने के कारण होने वाले पीलिया रोग कोआबस्ट्रक्टिव जॉण्डिस’ कहते हैं। इस दशा में मूत्र का रंग गहरा पीला, मल चिकना और सफेद या मिट्टी के रंग का होता है तथा लीवर की कार्यक्षमता शुरूआत में सामान्य होती है।

नवजात शिशु में पीलिया- नवजात शिशुओं में कभी-कभी खास तौर पर यदि जन्म से पहले अपरिपक्व जन्में हैं तो जन्म के बाद 2-3 बार हल्का पीलिया हो जाता है। वैज्ञानिकों के विचार में इस प्रकार के पीलिया का कारण लीवर का अपरिपक्व होना होता है। इन शिशुओं का उपचार अल्ट्रावायलेट किरणों में कुछ समय तक रखकर किया जाता है।

एक अन्य प्रकार का गंभीर जॉण्डिस बच्चों में मां और गर्भस्थ बच्चें में आर.एच. ब्लड ग्रुप के अलग-अलग होने के परिणामस्वरूप हो सकता है। यदि मां का ब्लड ग्रुप निगेटिव और पिता एवं गर्भस्थ शिशु का पॉजिटिव है तो शिशु की लाल रक्त कणिकाएं टूटने लगती हैं ऐसी दशा में बच्चा पीलिया ग्रसित जन्म ले सकता है, यदि रक्त में बिलिरूबिन का स्तर 20 मि.ग्रा. से ज्यादा है तो मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव हो सकता है। इस रोग की रोकथाम के लिए मां का ब्लड ग्रुप निगेटिव और पिता का पॉजिटिव है तो मां को गर्भावस्था की तीसरे तिमाही में तथा प्रसव के बाद एन्टीबाडीज के इन्जेक्शन दिए जाते हैं जिससे एन्टीजन नष्ट हो जाएं और गर्भस्थ शिशु तथा अगले बच्चे में समस्या न हो। यदि कोई शिशु रोगग्रसित जन्म लेता है तो उस नवजात शिशु का रक्त स्वच्छ बच्चे के ही रक्त गु्रप के रक्त से बदलकर उपचार किया जाता है। अनेक बच्चों में गुण सूत्रों में बदलाव के कारण लाल रक्त कणिकाओं में टूटने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।

वायरस हिपेटाइटिस-इस पीलिया के होने का सबसे सामान्य कारण लीवर का वायरस से संक्रमण है, लीवर को हिपेटाइटिस ए. बी. सी. डी. ई. प्रजाति के वायरस संक्रमित कर सकते हैं। ए और ई प्रजाति के वायरस से संक्रमण पीलिया होने का सबसे प्रमुख कारण है। हिपेटाइटिस बी, सी, डी, प्रजाति के वायरस से संक्रमण एड्स रोग के सदृश्य संक्रमित सूई से इन्जेक्शन लगने, संक्रमित मरीज के रक्त चढ़ाए जाने, संभोग से या गर्भस्थ शिशु को संक्रमित मां से फैल सकता है।



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